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तेरी गुल्लक में लागा चोर रामलला जाग जरा

आलेख : बादल सरोज

 

रामलला की गुल्लक की रकम लेकर चम्पत होने की खबर भले सरल हृदय और भोले धर्मावलम्बियों के लिए दिल दु:खाने और चौंकाने वाली बात रही हो, मगर हुआ वही है, जो राममंदिर के नाम पर शुरू से ही हो रहा था, पर उन्माद के ढोल-धमाकों में उसे छुपाया जाता रहा था। अब्राहम लिंकन के नाम से प्रसिद्घ जुमले की तर्ज पर कहें, तो प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शिलान्यासित, मोदी द्वारा उदघाटित, मोदी द्वारा प्राण-प्रतिष्ठित अयोध्या के मोदी के राममंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए जाने वाले चंदे में, मोदी द्वारा स्थापित ट्रस्ट में मोदी द्वारा नियुक्त और प्रस्थापितों के ‘‘अपने ही लडक़ों’’ द्वारा नल्ली लगाए जाने की खबर उजागर हुई है। मोदी द्वारा उपकृत और पोषित गोदी मीडिया द्वारा इस पर सुट्ट मारे जाने या हलके-फुल्के में लिए जाने के बावजूद, देश और दुनिया को पता चल ही गया कि ठगे जाने से राम भी नहीं बचे हैं।

इस लूट, जिसे चंदा चोरी कहा जा रहा है, का परिमाण और आयाम दोनों ही विराट हैं। अब तक की खबरों के मुताबिक़ लूटी गयी रकम 200 करोड़ रुपये से ज्यादा है। हालांकि ये अनुमान भी कच्चे हैं, सच्चे जोड़ तो शायद ही कभी सामने आयें — पर इतना तय है कि वे इससे कई गुना होंगे। इसलिए कि इस चोरी में सिर्फ हर रोज चढ़ने वाले चंदे की गुल्लक से गायब किये गए करेंसी नोट ही नहीं हैं, इनमें राम मंदिर बनाए जाने की मुहिम शुरू किये जाने के वक्त से लेकर मंदिर बन जाने के बाद तक इकट्ठा होती रही सोने, चांदी, हीरे और अष्टधातु की शिलाएं भी हैं, जो अब गायब बतायी जा रही हैं। इनमें से कुछ पर तो हीरे, मोती और माणिक्यों की जड़ाई भी थी। इन शिलाओं की संख्या ही 1250 बताते हैं। ये सोने के सिक्के या अशर्फियां नहीं हैं, सोने की ईंटें और पट्टिकाएं हैं, जाहिर है कि इनकी असली कीमत तो सैकड़ों करोड़ रुपयों से भी अधिक होगी। अब तक जिन तीन प्यादों को पकड़ा गया है, यह अकेले उनके बूते का मामला नहीं है। जो 1989 में इन शिलाओं की गिनती का हिसाब रखते थे, उन सज्जन ने मीडिया को बताया है कि मिट्टी की शिलाएं कारसेवकपुरम में रखी जाती थीं, आज भी वहीं हैं। मगर सोने-चांदी की शिलाओं की देख-रेख का जिम्मा खुद ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के पास था। इस तरह चंदे के चम्पतीकरण में मोदी नियुक्त चम्पत राय की लिप्तता स्पष्ट हो जाती है।

लूट निर्बाध तरीके से चले, इसके लिए पर्याप्त और व्यवस्थित इंतजाम किये गए थे। जानकार बताते हैं कि करीब डेढ़ वर्ष पूर्व जब मंदिर के नोट गिने जाने वाले अति-संवेदनशील हिस्से में सीसीटीवी लगाने का काम शुरू हुआ, तो खुद ट्रस्ट के ही एक बेहद रसूखदार पदाधिकारी ने यह कहकर रुकवा दिया था कि ‘‘सब अपने ही लडक़े हैं’’, इसलिए निगरानी-विगरानी की जरुरत नहीं है। सुरक्षा एजेंसियां इसके बाद भी छुपे और गोपनीय कैमरे लगा ही गयीं और उनमें ट्रस्ट के ‘‘अपने ही लडक़ों’’ की कारगुजारियां दर्ज भी हो गयीं। इन अपने ही पांच लड़कों के प्रति दिखाया गया अपनापन इतना गहरा था कि पांचों के पांचों का संग-साथ अविछिन्न रखा गया। लगातार कई वर्षों से न इनकी टीम में कोई अदल-बदल हुआ, ना ही शिफ्ट ही बदली गयी। स्वाभाविक है कि इतना विशेष अनुग्रह उनकी गिनाई क्षमता को देखकर तो नहीं ही किया गया होगा। इन पांचों में एक के घर में गोबर के ढ़ेर से 10 लाख रुपये बरामद हुए हैं। गोबर को इतना सम्मान शायद ही कभी मिला हो।

संरक्षण अंदर का ही नहीं, बाहर का भी था। छोटे-छोटे संस्थान भी इस तरह के काम में लगने वालों की बाहर निकलने के बाद जामा तलाशी लेते हैं —  मगर ये अपने ही लड़के थे, इसलिए कैबिनेट मंत्रियों और बड़े देशों के राजनयिकों जैसी सुविधा उन्हें दी गयी। जामा तलाशी तो दूर, सामान्य जांच से भी उन्हें बरी रखा गया। गलती से भी कहीं ऐसा न हो जाए, इसके लिए नोट गिनती कक्ष के ठीक आस-पास उत्तर प्रदेश पुलिस या किसी भी तरह के जवानों की ड्यूटी भी नहीं लगाई गयी।

यह अपने आप नहीं हुआ, ट्रस्ट के ‘‘रसूखदार अधिकारी’’ के निर्देश पर हुआ। ट्रस्ट में कौन हैं? मोदी गठित यह ट्रस्ट आरएसएस की राममंदिर शाखा है। इसमें चुन-चुनकर उन्हीं की नियुक्ति हुई है, जो पक्के मोदी वफादार होने के साथ ही संघ और उसकी विचारधारा में तपे-तपाये, मंदिर निर्माण आंदोलन में घुटे-घुटाये कलदार हैं। वैधानिक बाध्यता की वजह से ट्रस्ट का जो एकमात्र दलित सदस्य है, वह भी संघी पृष्ठभूमि का है। 1989 तक मोदी क्षितिज पर नहीं आये थे, सो उस बार का शिलान्यास इन्ही से करवाकर राजनीति की कढ़ी में सामाजिक समरसता का छौंक-बघार लगाया गया था।

ट्रस्ट के मोदी नियुक्त महासचिव स्वनामधन्य चम्पत राय शुद्ध खांटी संघी हैं — उनकी कुण्डली बताती है कि वे 1975 में आपातकाल के दौरान जेल में रहे। जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने रसायन विज्ञान के प्रोफेसर की सरकारी नौकरी छोड़ दी और पूर्णकालिक प्रचारक बन गए। 1980 के दशक में आरएसएस ने उन्हें विश्व हिन्दू परिषद में प्रतिनियुक्ति पर भेजा। फिर 1991 में उन्हें अयोध्या का क्षेत्रीय संगठन मंत्री बनाया गया। बाद में वे विहिप के केंद्रीय मंत्री, संयुक्त महामंत्री और अंतर्राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पदों पर भी रहे। ये वही चम्पत राय हैं, जिन्होंने मंदिर निर्माण के लिए हुई खरीदी में, चंद रोज पहले 3 करोड़ से कम में बिकी जमीन, 24 करोड़ में खरीदने का कीर्तिमान स्थापित किया था। यह एक घपला था, जो उजागर हुआ था। ऐसी खरीदियां और भी अनेक हुईं। मंदिर निर्माण का पूरा काम इनके ही हाथ में था। उनकी इजाजत के बिना राम मंदिर में राम के लिए भोग भी नहीं बनता था — जाहिर है कि बाकी सब भी उनकी मर्जी और भागीदारी के बिना नहीं हुआ है। अब यह सिर्फ संदेह या संभावना का विषय इसलिए नहीं बचता है, क्योंकि निगरानी और जांच से सुरक्षित रखे गये इन ‘अपने लड़कों’ के अलावा, जिनकी संपत्ति उछाल मारकर बढ़ी है और जिन्हें भी इस मलाई में रंगा-पुता माना जा रहा है, वे श्रीमान टुन्नू यादव हैं, जो चम्पत राय के ड्राइवर हैं।

इस चोट्टियाई के सामने आते ही संघी आइटी सेल ने इसे विपक्षी पार्टियों का दोषारोपण बताते हुए, राजनीतिक रंग देने की कोशिश की। इसके लिए इतने निम्न स्तर तक गिर गए कि उत्तरप्रदेश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी, सपा के अध्यक्ष की अवयस्क बेटी को लेकर एक घिनौनी मुहिम ही छेड़ दी। बहरहाल यह धोखाधड़ी ज्यादा नहीं चल पायी।  राममंदिर और उसके आंदोलन से जुड़े लोगों और शंकराचार्यों तक ने इस घोटाले को लेकर कड़े बयान देना शुरू कर दिए।

जन्मभूमि मंदिर के मोदी नियुक्त सरकारी ट्रस्ट के अध्यक्ष, महंत नृत्यगोपाल दास के उत्तराधिकारी शिष्य महंत कमलनयन दास तक बोल उठे कि, ‘अगर कहीं कोई गड़बड़ी हुई है, तो उसकी जांच अवश्य होनी चाहिए।’ इसी के साथ जांच पर भी अविश्वास जताते हुए उन्होंने कहा, ‘लेकिन जांच करेगा कौन? जांच करने वाले खुद बेईमान हैं। जो हल्ला मचा रहे हैं, वे भी दूध के धुले नहीं हैं। जो कभी साइकिल पर चलते थे, आज बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूम रहे हैं और आलीशान भवनों में रह रहे हैं। आखिर यह सब कैसे हुआ, इसका जवाब भी समाज को मिलना चाहिए।’ हालांकि बाद में निराश होते हुए उन्होंने यह कहकर कि ‘जो जैसा करेगा, भगवान उसे वैसा फल देंगे’ कहकर मामला भगवान भरोसे छोड़ दिया। उन्हें शायद पता नहीं कि बाकियों को भले याद हो या न हो, घोटालेबाजों को चाणक्य का कहा पक्के से याद है कि ‘शासक को यदि शासन करना है, तो उसे कभी ईश्वर से नहीं डरना चाहिए।’ इसलिए उन्हें ईश्वर-वीश्वर की परवाह नहीं है। चन्दा चोरी में पकड़े एक लवकुश मिश्रा नोटों की गिनती की ड्यूटी मिलते ही अपने यार-दोस्तों को 50 हजार रूपये की दारू पिलाकर अपनी धर्मनिष्ठा का परिचय दे चुके थे।

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने सीधे नाभि पर वार करते हुए कहा है कि ‘प्रधान मंत्री मोदी जी द्वारा राम मंदिर ट्रस्ट को अपने कार्यालय का एक डिपार्टमेंट मात्र बनाने के पीछे यही मंशा शुरू से थी कि वहां अपने चुनिंदे चोर-लुटेरों को बैठा कर मज़े से करोड़ों का चढ़ावा हर महीने लूटा जाए। चौकीदार चोर है, यह तो कब से सिद्ध हो चुका है!’ उन्होंने यह भी कहा कि  8 महीने का सीसीटीवी बिना चम्पत राय के निर्देश के डिलीट नहीं किया जा सकता। भाजपा नेता और बजरंग दल के संस्थापक विनय कटियार ने भी कहा है कि इस मामले की जांच होनी चाहिए, क्योंकि यह करोड़ों लोगों की श्रद्धा और विश्वास से जुड़ा विषय है।

प्रसंगवश बताना ठीक होगा कि राममंदिर के नाम पर कुनबे के आर्थिक घोटालों का यह तरीका नया है, मगर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। शुरू से ही घपलों और कांडों का सिलसिला चलता आया है। मंदिर आंदोलन के दौरान भी समय-समय पर चंदे के गबन की बातें सामने आती रही थीं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जब पांच हज़ार करोड़ रुपये से अधिक का चंदा प्राप्त हुआ, तब भी अनियमितताओं की खबरें आईं। मगर जब लिप्तता इतने ऊंचे स्तर तक की हो, तब इस तरह मुद्दों को दबाना आसान होता है। उस पर अगर कहीं वाचडॉग मीडिया ही लैपडॉग बनकर रह गया हो, तो फिर आंखों में धूल झोंकना ही क्या, आंखें फोड़ी भी जा सकती हैं। ऐसा हुआ भी है।

बाबा लाल दास के साथ जो हुआ वह  इसका प्रमाण है। 1980 के दशक की शुरुआत में लखनऊ उच्च न्यायालय द्वारा उन्हें बाबरी मस्जिद परिसर में रामलला की मूर्तियों का मुख्य महंत नियुक्त किया गया था। बाबा लाल दास का बयान आज भी मौजूद है, जिसमें उन्होंने  कहा था कि अयोध्या विवाद मूल रूप से एक स्थानीय और ज़मीनी विवाद है, इसे राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि विश्व हिंदू परिषद इस मुद्दे का राजनीतिक इस्तेमाल कर रही है। उनके अनुसार, ‘‘जो लोग ऐसा करना चाहते हैं, वे वास्तव में पूरे भारत में तनाव पैदा करने में अधिक रुचि रखते हैं, ताकि वे हिंदू वोटों को भुना सकें।’’ उन्होंने भगवान राम के नाम पर देश में फैलाई जा रही सांप्रदायिक घृणा और राजनीति की कड़ी निंदा की थी और बताया था कि अयोध्या में कैसे सदियों से हिंदू और मुस्लिम शांति और भाईचारे के साथ रहते आए थे। उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा का भी विरोध किया था, जिसके कारण तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार ने उन्हें मुख्य पुजारी के पद से हटा दिया था। इन्हीं बेबाक बयानों के कारण वे संघ परिवार और वीएचपी के निशाने पर आ गए थे। आखिर में 16 नवंबर 1993 को रानीपुर छत्तर गांव में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई।

इतना सब करके और देश को खदबदा कर पकाए गए जिस मंदिर मुद्दे की पूंछ पकडक़र संघी कुनबे ने सत्ता सुख भोगा है, उसमें से कोई इतनी बड़ी लूट सामने आने के बाद भी कुछ क्यों नहीं बोला। न जाने कितने सौ वर्ष बाद राम को छत नसीब करवाने का दावा ठोक कर सारा श्रेय लूटने और राम के बालरूप को अपनी उंगली पकड़ा कर उनके घर ले जाने वाले पोस्टर लगवाने की हिमाकत करने वाले प्रधानमंत्री मोदी चुप्प हैं। गृह मंत्री अमित शाह खामोश हैं । यहां तक कि बात-बात पर बेबात की बात करने वाले और संघ के रजिस्ट्रेशन के बारे में उठे सवाल पर ‘हिन्दू धर्म का भी तो रजिस्ट्रेशन नहीं है’ कहकर आरएसएस को हिन्दू धर्म के समकक्ष ला देने वाले संघ प्रमुख, मोहन भागवत भी कुछ नहीं बोले हैं। क्या पता वे इस कृत्य को महान सांस्कृतिक परम्परा का निर्वहन और सनातन सम्मत 64 कलाओं में से एक चौर्य कला का प्रदर्शन मानकर प्रमुदित हो रहे हों! वैसे ज्यादा संभावना अपने ही लड़कों के सच्चे अभिभावकों और उनके हस्तकौशल के हिस्सेदारों को बचाने के लिए ना बोलना ही ठीक समझने की है।

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक चंदा लूट की घटना उजागर हुए 15 दिन गुजर चुके हैं, मगर अभी तक अयोध्या या यूपी के किसी भी पुलिस थाने में एफआइआर दर्ज नहीं हुई है। एक विशेष जांच दल – एसआइटी – का गठन जरूर कर दिया गया है। वैसे यह अचंभे की बात है कि बिना संज्ञेय अपराध के दर्ज हुए ही एसआइटी क्या और कैसी जांच करने वाली है। यह आशंका निराधार नहीं है कि कुछ समय के लिए घेर घार कर प्यादों को सामने कर दिया जाएगा और ऊपर वाले बचा लिए जाएंगे। यह भी नामुमकिन नहीं कि पूरा कांड ही खारिज कर दिया जाए और इसे झूठा बताते हुए राष्ट्र और हिन्दुओं को बदनाम करने की साजिश करार दे दिया जाए। सत्ता में मोदी और गोदी में मीडिया हो तो, यह भी मुमकिन है।

मगर जो बात एक बार फिर पक्की तरह से प्रमाणित हुई है, वह यह है कि साम्प्रदायिकता की राजनीति करने और नफरती उन्माद पैदा करने के लिए धर्मध्वजा धारण करने वालों का न तो किसी धर्म में विश्वास होता है, ना ही किसी धर्म के उतार या चढ़ाव के साथ उनका कोई संबंध होता है। वे जिस धर्म के नाम पर तूमार खड़ा करते हैं, उसे ही सबसे पहले ठगते हैं। इस कुनबे में तो यह सावरकर के जमाने से ही वंशानुगत है — जो इन दिनों कभी गाय की उम्र, तो कभी उसके कौमार्य के आधार पर, उसे मां या कोरमा माने जाने के रोचक सिद्धांतों में दिख रहा है। तुलसी इन्हीं जैसों के लिए लिख गए हैं :

‘‘बंचक भगत कहाइ राम के। किंकर कंचन कोह काम के॥
तिन्ह मंह प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरम ध्वज धंधक धोरी॥’’
(जो राम के भक्त कहलाकर लोगों को ठगते हैं, जो धन लोभ, क्रोध और काम के गुलाम हैं और जो धींगा-धींगी करने वाले, धर्म की झूठी ध्वजा फहराने वाले दंभी और कपट के धंधों का बोझ ढोने वाले हैं, संसार के ऐसे लोगों में सबसे पहले मेरी गिनती है।)

(लेखक लोकजतन के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।

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