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दुनिया

बंगाल का ‘रक्तचक्र’: परिवर्तन, प्रतिशोध और राजनीति की हिंसक विरासत

क्या बंगाल में सत्ता परिवर्तन अब लोकतांत्रिक उत्सव नहीं, बल्कि हिंसा का स्थायी अध्याय बन चुका है?
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘पोरिबोर्तन’ यानी परिवर्तन का नारा अब केवल लोकतांत्रिक बदलाव का प्रतीक नहीं रह गया है। बीते कई दशकों में बंगाल ने हर सत्ता परिवर्तन के साथ राजनीतिक संघर्ष, खून-खराबा और प्रतिशोध की नई कहानियाँ देखी हैं। चुनाव खत्म होने के बाद भी हिंसा की आग शांत नहीं होती, बल्कि कई बार और तेज हो जाती है।
हिंसा की जड़ें: सत्ता बदलती रही, तरीका नहीं
बंगाल की राजनीतिक संस्कृति में हिंसा कोई नई घटना नहीं है। 60 और 70 के दशक के नक्सलबाड़ी आंदोलन से लेकर सिद्धार्थ शंकर राय के दौर तक राजनीतिक विरोध कई बार शारीरिक समाप्ति की रणनीति में बदल गया। बाद में वामपंथी शासन के लंबे दौर में ‘कैडर राजनीति’ ने हिंसा को संगठित रूप दिया। मरीचझापी, नंदीग्राम और सिंगूर जैसी घटनाएँ इसकी गवाह बनीं।
2011 में ममता बनर्जी ने “मां, माटी, मानुष” के नारे के साथ बदलाव का वादा किया था। उम्मीद थी कि राजनीतिक हिंसा कम होगी, लेकिन समय के साथ आरोप लगे कि सत्ता बदलने के बावजूद राजनीतिक संस्कृति नहीं बदली। अब भाजपा के उभार और उसके बाद की टकराहट ने बंगाल को फिर तनावपूर्ण दौर में ला खड़ा किया है।
विचारधारा से पहचान की लड़ाई तक
हाल के वर्षों में बंगाल की राजनीति सिर्फ चुनावी प्रतिस्पर्धा नहीं रही, बल्कि पहचान आधारित संघर्ष में बदलती दिखाई दे रही है। एक ओर हिंदुत्व आधारित राजनीति जनसांख्यिकीय बदलाव और घुसपैठ को बड़ा मुद्दा बना रही है, तो दूसरी ओर क्षेत्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक पहचान की राजनीति भी आक्रामक रूप लेती जा रही है।
राजनीतिक भाषणों में “सबक सिखाना”, “बाहर खदेड़ना” और “कड़ा जवाब” जैसे शब्द लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करते दिख रहे हैं। इससे राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता धीरे-धीरे सामाजिक विभाजन में बदलने लगी है।
सीमावर्ती राजनीति और बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव
बंगाल की राजनीति अब केवल राज्य की सीमा तक सीमित नहीं रह गई है। बांग्लादेश और अवैध घुसपैठ जैसे मुद्दे सीधे चुनावी विमर्श का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में राज्य की आंतरिक राजनीति का असर अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक दिखाई देने लगा है। राजनीतिक बयानबाजी यदि पड़ोसी देशों के साथ तनाव बढ़ाने लगे, तो यह केवल स्थानीय विवाद नहीं रह जाता।
क्या ‘पोरिबोर्तन’ सिर्फ चेहरों का बदलाव है?
बंगाल में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वास्तव में राजनीति की कार्यप्रणाली बदल रही है, या सिर्फ सत्ता संभालने वाले चेहरे बदल रहे हैं? मतदाता सूची से नाम हटाने, राजनीतिक ध्रुवीकरण और प्रशासनिक पक्षपात जैसे आरोप लगातार राजनीतिक माहौल को और विषाक्त बना रहे हैं।
एक पक्ष इसे लोकतांत्रिक सुधार कहता है, तो दूसरा इसे लोकतंत्र पर हमला बताता है। लेकिन इन आरोप-प्रत्यारोपों के बीच आम नागरिक सबसे अधिक असुरक्षित महसूस कर रहा है।
चुनाव बाद हिंसा: लोकतंत्र पर सबसे बड़ा सवाल
चुनाव परिणाम आने के बाद कई इलाकों में हिंसा, हत्या, तोड़फोड़ और राजनीतिक प्रतिशोध की घटनाएँ सामने आईं। भाजपा और तृणमूल कांग्रेस दोनों ही एक-दूसरे पर कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने के आरोप लगाते रहे हैं। कई स्थानों पर राजनीतिक कार्यालयों पर कब्ज़ा और झंडा बदलने की घटनाएँ भी सामने आईं।
यह स्थिति बताती है कि बंगाल में राजनीति धीरे-धीरे “विचारों की लड़ाई” से “वर्चस्व की लड़ाई” में बदलती जा रही है।
लोकतंत्र या प्रतिशोध की राजनीति?
लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है, लेकिन यदि हर चुनाव के बाद हिंसा और बदले की भावना बढ़े, तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए गंभीर खतरा बन जाता है। जीत यदि संवाद के बजाय डर और दबाव के जरिए स्थापित होने लगे, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ जाती है।
बंगाल को किस बदलाव की जरूरत?
यदि बंगाल को सचमुच परिवर्तन चाहिए, तो वह केवल सरकार बदलने से नहीं आएगा। वास्तविक ‘पोरिबोर्तन’ तब होगा जब राजनीतिक दल हिंसा की संस्कृति को छोड़कर लोकतांत्रिक सह-अस्तित्व को स्वीकार करेंगे।
सत्ता परिवर्तन का अर्थ प्रतिशोध नहीं होना चाहिए। बंगाल की जनता शांति, स्थिरता और विकास चाहती है — न कि हर चुनाव के बाद भय और रक्तपात का नया अध्याय।
आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है — क्या बंगाल कभी मतपत्र की ताकत को गोलियों की आवाज़ से ऊपर रख पाएगा?

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