सम्राट कामदेव सिंह: बेगूसराय का वह नाम, जिसे इतिहास आज भी भूल नहीं पाया
"माफिया भी, मसीहा भी"

बेगूसराय की मिट्टी ने अनेक ऐसे व्यक्तित्वों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने समय पर गहरी छाप छोड़ी। इन्हीं नामों में एक नाम है—कामदेव सिंह। कुछ लोग उन्हें गरीबों का मसीहा मानते हैं, कुछ बाहुबली राजनीति का प्रतीक, तो कुछ उन्हें बिहार के अपराध जगत का सबसे चर्चित चेहरा बताते हैं। उनके व्यक्तित्व को एक ही नजरिए से परिभाषित करना आसान नहीं है।
प्रारंभिक जीवन
कामदेव सिंह का जन्म लगभग वर्ष 1930 के आसपास बेगूसराय जिले के मटिहानी प्रखंड के नयागांव में एक साधारण भूमिहार परिवार में हुआ था। कहा जाता है कि बचपन में उन्होंने सामान्य ग्रामीण जीवन बिताया और प्रारंभिक दौर में पशुपालन का कार्य भी किया। लेकिन समय के साथ उनका जीवन अपराध और सत्ता के प्रभाव वाले रास्ते की ओर मुड़ गया।
अपराध जगत में प्रवेश
1950 के दशक के अंत में उन्होंने डकैत के रूप में अपनी पहचान बनानी शुरू की। धीरे-धीरे उनका प्रभाव बढ़ता गया और 1960-70 के दशक तक उन्होंने उत्तर बिहार में एक मजबूत नेटवर्क खड़ा कर लिया।
बताया जाता है कि उनका नेटवर्क केवल बेगूसराय तक सीमित नहीं था, बल्कि बिहार के अन्य जिलों, उत्तर प्रदेश, नेपाल तथा कोलकाता, मुंबई और जयपुर जैसे शहरों तक फैला हुआ था। तस्करी, अवैध कारोबार और हथियारबंद सहयोगियों के कारण उनका प्रभाव लगातार बढ़ता गया।
“माफिया भी, मसीहा भी”
कामदेव सिंह को लेकर लोगों की राय आज भी बंटी हुई है।
- समर्थकों का कहना था कि वे गरीबों की मदद करते थे।
- जरूरतमंदों की आर्थिक सहायता करते थे।
- गांव के लोगों के विवाद सुलझाते थे।
- उनके दरबार से कोई खाली हाथ नहीं लौटता था।
वहीं आलोचकों के अनुसार—
- उन्होंने भय और हिंसा का सहारा लिया।
- चुनावों में बूथ कब्जाने जैसे कार्यों में उनकी भूमिका रही।
- राजनीतिक ताकत हासिल करने के लिए अपराध का इस्तेमाल किया गया।
- विरोधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाती थी।
इसी वजह से उन्हें कुछ लोगों ने “रॉबिन हुड” कहा, जबकि कई लोगों ने उन्हें “बिहार का गॉडफादर” और “पाब्लो एस्कोबार ऑफ बिहार” तक की संज्ञा दी।
बेगूसराय का राजनीतिक माहौल
1970 का दशक बेगूसराय की राजनीति का सबसे उथल-पुथल भरा दौर माना जाता है। उस समय बेगूसराय को वामपंथी राजनीति का गढ़ कहा जाता था और इसे “पूर्व का लेनिनग्राद” भी कहा जाता था।
ऐसे माहौल में कामदेव सिंह एक मजबूत विरोधी शक्ति के रूप में उभरे। कहा जाता है कि उनका प्रभाव चुनावों और स्थानीय सत्ता समीकरणों तक पहुंच चुका था। कई राजनीतिक दलों और नेताओं से उनके संबंधों की चर्चाएं होती थीं, हालांकि इन दावों को लेकर मतभेद भी मौजूद हैं।
पुलिस रिकॉर्ड और इनाम
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार उनके खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज थे। वर्ष 1979 तक उन पर इनाम भी घोषित किया गया था। पुलिस लंबे समय से उनकी तलाश कर रही थी, लेकिन वे गिरफ्तारी से बचते रहे। उनके प्रभाव और संपर्कों के कारण उन्हें पकड़ना आसान नहीं माना जाता था।
कैसे हुआ अंत?
15 मई 1980 को बिहार पुलिस और सीआरपीएफ ने संयुक्त अभियान चलाया। नयागांव में हुई कार्रवाई के दौरान कामदेव सिंह मारे गए।
पुलिस का दावा था कि यह मुठभेड़ थी, जबकि उनके परिवार और समर्थकों ने इसे फर्जी मुठभेड़ बताया। इस घटना को लेकर आज भी अलग-अलग कहानियां सुनने को मिलती हैं। लेकिन इतना तय है कि उनकी मौत के साथ बिहार के एक बड़े अध्याय का अंत हुआ।
लोक स्मृतियों में कामदेव सिंह
आज भी बेगूसराय के गांवों की चौपालों में बुजुर्ग उनके किस्से सुनाते हैं। कोई उन्हें गरीबों का सहारा बताता है, तो कोई भय का दूसरा नाम।
इतिहास के पन्नों में उनका नाम एक विवादित लेकिन प्रभावशाली व्यक्तित्व के रूप में दर्ज है। शायद यही कारण है कि उनके निधन के चार दशक से अधिक समय बाद भी लोग उन्हें भूले नहीं हैं।
निष्कर्ष
कामदेव सिंह का जीवन हमें यह समझाता है कि इतिहास केवल काला या सफेद नहीं होता। एक ही व्यक्ति किसी के लिए नायक हो सकता है और किसी दूसरे के लिए खलनायक। उनका जीवन बिहार की उस राजनीति, सामाजिक संघर्ष और अपराध-सत्ता के गठजोड़ की कहानी भी है, जिसने एक पूरे दौर को प्रभावित किया।
आपकी नजर में कामदेव सिंह कौन थे—गरीबों के मददगार, एक प्रभावशाली नेता, या विवादों से घिरा व्यक्तित्व? अपनी राय जरूर साझा करें।
स्रोत: इंडिया टुडे, आज तक की रिपोर्टें, इंटरनेट पर उपलब्ध सार्वजनिक ऐतिहासिक सामग्री, तथा विभिन्न प्रकाशित संदर्भ। प्रस्तुत सामग्री का उद्देश्य ऐतिहासिक एवं जनचर्चाओं का तथ्यात्मक संकलन है।



